नाड़ी परीक्षण कब करना चाहिए
नाड़ी की जांच के लिए सबसे सही समय सुबह खाली पेट होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि भोजन व तेल मालिश के बाद नाड़ी की गति अनिश्चित व अस्थिर हो जाती है। इसलिए इन क्रियाओं के बाद नाड़ी परीक्षा से रोग को इलाज करना मुश्किल हो जाता है। इसी तरह यदि रोगी भूखा प्यासा हो तो भी नाड़ी की गति का ठीक से पता नहीं चल पाता है।
कैसे करते हैं नाड़ी परीक्षण
आमतौर पर पुरुषों के दायें हाथ की और स्त्रियों के बाएं हाथ की नाड़ी की गति देखी जाती है। हालांकि कभी कभी दोनों हाथों की नाड़ी देखने पर ही स्पष्ट जानकारी हासिल हो पाती है। हथेली से लगभग आधा इंच नीचे का स्थान छोड़कर नाड़ी का परीक्षण किया जाता है।
नाड़ी परीक्षण के दौरान मरीज को अपनी बाहें सीधी और फैलाकर रखनी चाहिए और हाथ को बिल्कुल ढीला छोड़ देना चाहिए। इस दौरान हाथ की उंगलियाँ व अंगूठा सीधा और फैला हुआ होना चाहिए। चिकित्सक को अपने दायें हाथ से नाडी देखनी चाहिए। इस विधि में हाथ की तीन उंगलियाँ तर्जनी, मध्यमा और अनामिका का प्रयोग किया जाता है।
तर्जनी ऊँगली अंगूठे के निचले हिस्से पर रखी जाती है। नाड़ी पर तीनो ऊँगलियों के पोरों से हल्का लेकिन एक जैसा दवाब डालकर गति महसूस करना चाहिए। एकदम सही और निश्चित गति जानने के लिए बार-बार अंगुलियों को वहां से हटाकर फिर रखना चाहिए।
इस प्रकार, जिस अंगुली के पोर में नाडी की गति का दबाव अधिक अनुभव होता है, उसी के आधार पर रोग का पता लगाया जाता है। यदि तर्जनी अंगुली में गति का दबाव अधिक है, तो इसका मतलब है कि रोगी में वात दोष की प्रधानता है। मध्यमा (बीच वाली) अंगुली में गति के दबाव से पित्त की अधिकता और अनामिका अंगुली में दबाव की अनुभूति से कफ दोष की प्रधानता का पता चलता है।
ऐसा बताया गया है कि नाड़ी की गति से भी रोग का पता चलता है। जैसे कि अगर नाडी की गति साँप की गति जैसी है, तो इसका मतलब है कि वात दोष अधिक है। अगर यह मेंढक की चाल जैसी है तो इसका मतलब है पित्त दोष बढ़ा हुआ है। इसी तरह अगर नाड़ी की गति कबूतर की चाल के समान है तो समझिये कि कफ दोष बढ़ा हुआ है।