केरल आयुर्वेद में बीमारी का इलाज नाड्डी देख के किया जाता है।View more

कफ दोष क्या है ?

कफ दोष के कारण आने वाली बीमारी

बीमारी के कारण ..

कफ दोष

कफ दोष क्या है :

आयुर्वेद में बताया गया है कि हर एक इंसान की एक ख़ास प्रकृति होती है। अधिकांश लोगों को अपनी प्रकृति के बारे में कोई अंदाज़ा नहीं होता है जबकि आप अपनी आदतों और स्वभाव के आधार पर बहुत आसानी से अपनी प्रकृति जान सकते हैं। जैसे कि किसी काम को शुरु करने में आप बहुत देरी करते हैं या आप चाल बहुत धीमी और गंभीर है तो यह दर्शाता है कि आप कफ प्रकृति के हैं। इस लेख में हम आपको कफ प्रकृति के लक्षणों, इससे जुड़े रोगों और उपायों के बारे में विस्तार से बता रहे हैं।

कफ दोष क्या है?

कफ दोष, ‘पृथ्वी’ और ‘जल’ इन दो तत्वों से मिलकर बना है। ‘पृथ्वी’ के कारण कफ दोष में स्थिरता और भारीपन और ‘जल’ के कारण तैलीय और चिकनाई वाले गुण होते हैं। यह दोष शरीर की मजबूती और इम्युनिटी क्षमता बढ़ाने में सहायक है। कफ दोष का शरीर में मुख्य स्थान पेट और छाती हैं।

कफ शरीर को पोषण देने के अलावा बाकी दोनों दोषों (वात और पित्त) को भी नियंत्रित करता है। इसकी कमी होने पर ये दोनों दोष अपने आप ही बढ़ जाते हैं। इसलिए शरीर में कफ का संतुलित अवस्था में रहना बहुत ज़रूरी है।

कफ दोष के प्रकार :

शरीर में अलग स्थानों और कार्यों के आधार पर आयुर्वेद में कफ को पांच भागों में बांटा गया है।

  • क्लेदक
  • अवलम्बक
  • बोधक
  • तर्पक
  • श्लेषक
  • आयुर्वेद में कफ दोष से होने वाले रोगों की संख्या करीब 20 मानी गयी है।

कफ बढ़ने के कारण :

मार्च-अप्रैल के महीने में, सुबह के समय, खाना खाने के बाद और छोटे बच्चों में कफ स्वाभाविक रुप से ही बढ़ा हुआ रहता है। इसलिए इन समयों में विशेष ख्याल रखना चाहिए। इसके अलावा खानपान, आदतों और स्वभाव की वजह से भी कफ असंतुलित हो जाता है। आइये जानते हैं कि शरीर में कफ दोष बढ़ने के मुख्य कारण क्या हैं।

  • मीठे, खट्टे और चिकनाई युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन
  • मांस-मछली का अधिक सेवन
  • तिल से बनी चीजें, गन्ना, दूध, नमक का अधिक सेवन
  • फ्रिज का ठंडा पानी पीना
  • आलसी स्वभाव और रोजाना व्यायाम ना करना
  • दूध-दही, घी, तिल-उड़द की खिचड़ी, सिंघाड़ा, नारियल, कद्दू आदि का सेवन

कफ बढ़ जाने के लक्षण :

शरीर में कफ दोष बढ़ जाने पर कुछ ख़ास तरह के लक्षण नजर आने लगते हैं। आइये कुछ प्रमुख लक्षणों के बारे में जानते हैं।

  • हमेशा सुस्ती रहना, ज्यादा नींद आना
  • शरीर में भारीपन
  • मल-मूत्र और पसीने में चिपचिपापन
  • शरीर में गीलापन महसूस होना
  • शरीर में लेप लगा हुआ महसूस होना
  • आंखों और नाक से अधिक गंदगी का स्राव
  • अंगों में ढीलापन
  • सांस की तकलीफ और खांसी
  • डिप्रेशन

वहीं, कफ दोष में असंतुलन आने के शारीरिक लक्षणों की बात करें तो इसमें अधिक म्‍यूकस बनना, वजन बढ़ना, जीभ पर सफेद परत जमना, साइनस में कफ जमना, पाचन खराब होना, कमजोरी, धमनियों में वसा जमना, प्री-डायबिटीज, खांसी, जुकाम, नाक बहना, हे फीवर, ठंडा पसीना आना, बार-बार पेशाब आना, कान में अधिक मैल जमना, त्‍वचा और बालों का तैलीय ...

विरेचन

बढे हुए पित्त को शांत करने के लिए विरेचन (पेट साफ़ करने वाली औषधि) सबसे अच्छा उपाय है। वास्तव में शुरुआत में पित्त आमाशय और ग्रहणी (Duodenum) में ही इकठ्ठा रहता है। ये पेट साफ़ करने वाली औषधियां इन अंगों में पहुंचकर वहां जमा पित्त को पूरी तरह से बाहर निकाल देती हैं।

पित्त को संतुलित करने के लिए क्या खाएं

अपनी डाइट में बदलाव लाकर आसानी से बढे हुए पित्त को शांत किया जा सकता है. आइये जानते हैं कि पित्त के प्रकोप से बचने के लिए किन चीजों का सेवन अधिक करना चाहिए.

  • घी का सेवन सबसे ज्यादा ज़रुरी है।
  • गोभी, खीरा, गाजर, आलू, शिमला मिर्च और हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन करें।
  • सभी तरह की दालों का सेवन करें।
  • एलोवेरा जूस, अंकुरित अनाज, सलाद और दलिया का सेवन करें।

पित्त प्रकृति वाले लोगों को क्या नहीं खाना चाहिए

खाने-पीने की कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिनके सेवन से पित्त दोष और बढ़ता है। इसलिए पित्त प्रकृति वाले लोगों को इन चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।

  • मूली, काली मिर्च और कच्चे टमाटर खाने से परहेज करें।
  • तिल के तेल, सरसों के तेल से परहेज करें।
  • काजू, मूंगफली, पिस्ता, अखरोट और बिना छिले हुए बादाम से परहेज करें।
  • संतरे के जूस, टमाटर के जूस, कॉफ़ी और शराब से परहेज करें।

पित्त बढ़ने से कौन कौन से रोग होते हैं?

पित्त दोष (Pitta Dosha) वाले लोगों को पेट में एसिडिटी और कब्ज (Acidity and Constipation ) की समस्या बनी रहती है. पित्त दोष होने पर खाना अच्छी तरह से डायजेस्ट नहीं हो पाता है. स्वस्थ रहने के लिए शरीर में पित्त का संतुलन होना जरूरी है. ऐसे लोगों को खाने में ठंडी और मीठी चीजों का सेवन करना चाहिए.

जैसा कि हमने ऊपर कहा, अतिरिक्त पित्त शरीर में विभिन्न बदलावों का कारण बन सकता है। इस खंड में, हम कुछ सामान्य अतिरिक्त पित्त दोष लक्षणों के बारे में बात करते हैं :

  • शरीर में गर्मी बढ़ जाती है और परेशानी होने लगती है।
  • शरीर में सूजन के कारण जोड़ों में दर्द हो सकता है।
  • पेट की गर्मी बढ़ जाती है, जिससे सीने में जलन, एसिड रिफ्लक्स और अल्सर हो जाता है।
  • दस्त, कब्ज, या बिगड़ा हुआ पाचन।
  • क्रोध, चिड़चिड़ापन और हताशा में वृद्धि।
  • पसीना आना और शरीर से दुर्गंध बढ़ना।
  • भूख और प्यास का बढ़ना।
  • जलन के साथ सिरदर्द।
  • चक्कर आना और/या गर्मी लगना।
  • अंडकोष/स्तन में भारीपन या कोमलता।
  • निर्णयात्मक बनना और पूर्णतावादी बनने का प्रयास करना।
  • अहंकार महँगाई.
  • लक्ष्यों के प्रति अत्यधिक लगाव.
  • अस्थिरता की बढ़ती भावना.
  • ईर्ष्या की भावना.
  • आगे बढ़ते हुए, शरीर पर उच्च पित्त स्तर के दुष्प्रभावों को देखना भी महत्वपूर्ण है:
  • पेट में जलन
  • खुजली
  • जिल्द की सूजन
  • सूर्य के संपर्क के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता
  • मुंहासा
  • अम्ल प्रतिवाह
  • अल्सर
  • बार-बार बुखार आना
  • अतिगलग्रंथिता
  • पीलिया
  • जोड़ों की तीव्र सूजन
  • थकान
  • दृष्टि संबंधी समस्याएं, आंखों में जलन
  • ऑटोइम्यून स्वास्थ्य विकार
  • समग्र कल्याण सुनिश्चित करने के लिए, पित्त के स्तर को प्रबंधित करना और इसके असंतुलन को ट्रिगर करने वाले निम्नलिखित कारकों से बचना महत्वपूर्ण है।

शरीर में कफ का असंतुलन व्यायाम न करने, अधिक गरिष्ठ भोजन खाने से होता है। इस स्थिति में शरीर के तापमान में बदलाव होने से कई बार कफ संबंधी रोग हा़े सकते हैं।

  1. तृप्ति- तृप्त होना (पूरी तरह से भारी पदार्थों के सेवन से तृप्त होकर शरीर में कफ बढ़कर भारीपन आ जाना)।
  2. तन्द्रा-ऊंघना (नींद की झपकी लेना)
  3. निद्रा का अधिक आना
  4. स्तैमित्य- शरीर जकड़ जाना या कोई अंग जकड़ जाना।
  5. शरीर में भारीपन
  6. आलस्य
  7. मुख का मीठापन।
  8. मुख से पानी गिरना।
  9. कफ निकलना।
  10. नेत्र से गंदा पानी बार-बार निकलना।
  11. बलासक- बल का क्षय या मंद ज्वर या शोथ का होना।
  12. अपच (बदहजमी)।
  13. हृदय पर कफ का लेप।
  14. कंठ में कफ जैसा अनुभव करना।
  15. धमनियों का कफ से भरा होना।
  16. गलगण्ड- (गर्दन के पीछे वाले हिस्से में गांठ)। थायरॉइड ग्रंथि के बढ़ने से गांठ हो जाती है जिसे गलगण्ड कहते हैं, अधिक बढ़ने पर आंखें बाहर आने लगती हैं।
  17. अतिस्थूलता- अधिक मोटापा,
  18. मन्दाग्नि- भूख की कमी।
  19. उदर्द (एलर्जी जैसा)- त्वचा में लाल-लाल ददोड़े होना, खुजली होना।
  20. शरीर का श्वेत होना (सफेद पडऩा)।

कफ दोष बढ़ने से मुंह में मीठे का स्‍वाद, त्‍वचा का पीला होना, शरीर में ठंडापन, खुजली, पेशाब और पसीने से जुड़ी समस्‍या, बेचैनी, साइनसाइटिस, कोल्‍ड, मुंह और आंख से मोकस सिक्रेशन (mucous secretion) का बढ़ना, अस्‍थमा, गली की खराश, खांसी और डायबिटीज जैसी समस्‍याएं हो सकती हैं।

शरीर में कफ के असंतुलन से होती हैं तमाम बीमारियां

  1. तृप्ति- तृप्त होना (पूरी तरह से भारी पदार्थों के सेवन से तृप्त होकर शरीर में कफ बढ़कर भारीपन आ जाना)।
  2. तन्द्रा-ऊंघना (नींद की झपकी लेना)
  3. निद्रा का अधिक आना
  4. स्तैमित्य- शरीर जकड़ जाना या कोई अंग जकड़ जाना।
  5. शरीर में भारीपन
  6. आलस्य
  7. मुख का मीठापन।
  8. मुख से पानी गिरना।
  9. कफ निकलना।
  10. नेत्र से गंदा पानी बार-बार निकलना।
  11. बलासक- बल का क्षय या मंद ज्वर या शोथ का होना।
  12. अपच (बदहजमी)।
  13. हृदय पर कफ का लेप।
  14. कंठ में कफ जैसा अनुभव करना।
  15. धमनियों का कफ से भरा होना।
  16. गलगण्ड- (गर्दन के पीछे वाले हिस्से में गांठ)। थायरॉइड ग्रंथि के बढ़ने से गांठ हो जाती है जिसे गलगण्ड कहते हैं, अधिक बढ़ने पर आंखें बाहर आने लगती हैं।
  17. अतिस्थूलता- अधिक मोटापा,
  18. मन्दाग्नि- भूख की कमी।
  19. उदर्द (एलर्जी जैसा)- त्वचा में लाल-लाल ददोड़े होना, खुजली होना।
  20. शरीर का श्वेत होना (सफेद पडऩा)।

कफ दोष बढ़ने से मुंह में मीठे का स्‍वाद, त्‍वचा का पीला होना, शरीर में ठंडापन, खुजली, पेशाब और पसीने से जुड़ी समस्‍या, बेचैनी, साइनसाइटिस, कोल्‍ड, मुंह और आंख से मोकस सिक्रेशन (mucous secretion) का बढ़ना, अस्‍थमा, गली की खराश, खांसी और डायबिटीज जैसी समस्‍याएं हो सकती हैं।