केरल आयुर्वेद में बीमारी का इलाज नाड्डी देख के किया जाता है। | केरल आयुर्वेद में बीमारी का इलाज नाड्डी देख के किया जाता है। | केरल आयुर्वेद में बीमारी का इलाज नाड्डी देख के किया जाता है। | केरल आयुर्वेद में बीमारी का इलाज नाड्डी देख के किया जाता है। | केरल आयुर्वेद में बीमारी का इलाज नाड्डी देख के किया जाता है। | केरल आयुर्वेद में बीमारी का इलाज नाड्डी देख के किया जाता है। | केरल आयुर्वेद में बीमारी का इलाज नाड्डी देख के किया जाता है। | केरल आयुर्वेद में बीमारी का इलाज नाड्डी देख के किया जाता है। | केरल आयुर्वेद में बीमारी का इलाज नाड्डी देख के किया जाता है। | केरल आयुर्वेद में बीमारी का इलाज नाड्डी देख के किया जाता है। | केरल आयुर्वेद में बीमारी का इलाज नाड्डी देख के किया जाता है। | केरल आयुर्वेद में बीमारी का इलाज नाड्डी देख के किया जाता है। |

वात दोष क्या है?

लगभग 12% वात रोग का कारण आहार से संबंधित होता है, और इसमें अल्कोहल, फ्रक्टोज-से मीठे किये गये पेय, मीट और समुद्री भोजन के उपभोग के साथ मज़बूत संबंध होता है। अन्य ट्रिगरों में शारीरिक बड़ी चोट और सर्जरी शामिल हैं।

वात के प्रकार
वात दोष के पांच भेद
  1. प्राण वात
  2. समान वात
  3. उदान वात
  4. अपान वात
  5. व्‍यान वात

शरीर में वात बढ़ने से क्या होता है?

जो लोग वात रोग से पीड़ित होते हैं, उनमें उच्च रक्तचाप, डायबिटीज मेलिटस, चयापचय सिंड्रोम, तथा गुर्दे सम्बन्धी बीमारियों के साथ कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों का उच्च जोखिम होने के कारण मृत्यु जोखिम भी अधिक होता है।

वात प्रकृति के लोग कैसे होते हैं?

वात प्रकृति वाले लोग अधिकतम निर्णय बहुत जल्दी ले लेते हैं, उन्हें शीघ्र ही ग़ुस्सा आने की संभावना बनी रहती है, परंतु साथ ही वे इन बातों को जल्दी भूल भी जाते हैं।

  1. प्राण वात
  2. समान वात
  3. उदान वात
  4. अपान वात
  5. व्‍यान वात

वात की पहचान कैसे करें?

  • बहुत अधिक गुस्सा आना
  • मुंहासे निकलना
  • शरीर में सूजन
  • हॉट फ्लैशेज
  • स्किन पर रैशेज
  • सीने पर जलन
  • खट्टी डकार आना
  • मितली आना

वात दोष का राजा क्यों है?

वात दोष वायु और आकाश से बना है और क्रिया, परिवहन और गति से योग्य है। वात को "दोषों का राजा" माना जाता है क्योंकि यह अन्य दो दोषों (पित्त और कफ) को सक्रिय करता है ।

वात दोष में क्या परहेज करना चाहिए?

अधिकांश कच्ची सब्जियों सहित अत्यधिक सूखी, खुरदरी और ठंडी सब्जियों से बचें। यदि आपको कच्ची सब्जियाँ, सलाद, या वात-बढ़ाने वाली कोई भी सब्ज़ी खानी है, तो मात्रा कम रखें और दोपहर के समय खाएं, जब पाचन शक्ति अपने चरम पर हो।

क्या वात दोष ठीक हो सकता है?

शरीर से वात को दूर करने का दूसरा तरीका आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों और मसालों जैसे अदरक, हल्दी, जीरा और धनिया का उपयोग है। ये जड़ी-बूटियाँ वात दोष को शांत करने और शरीर में संतुलन वापस लाने में मदद करती हैं। अंतिम लेकिन महत्वपूर्ण बात, शरीर से वात को दूर करने का दूसरा तरीका योग और ध्यान है।

वात दोष में क्या खाएं

फल: मीठे फल, केला, नारियल, खजूर, ताजे अंजीर, आम, मीठे अंगूर, खरबूजा, संतरा, पपीता, अनानास, भीगी हुई किसमिस और मूंगफली सेवन कर सकते हैं। सब्जियां: पकाई हुई सब्जियां, पकाया हुआ प्याज, मेथी, अंकुरित बीज, गाजर, खीरा, कद्दू, मूली, लहसुन आदि। मूंग दाल, सभी प्रकार के चावल और गेहूं। इसके अलावा सभी प्रकार के मसाले जैसे- हींग, इलायची, तुलसी, काली मिर्च, अदरक, पुदीना, नींबू, आम का अचार आदि। सभी प्रकार के दूध, मक्खन, छाछ, पनीर, आइसक्रीम, दही आदि। सभी प्रकार के फलों के जूस।

अधिक मात्रा में फल का सेवन खासकर सेब, नाशपाती, अनार और तरबूज। सूखी सब्जियां, कच्ची सब्जियां, गोभी, फूल गोभी, कच्चा प्याज, मटर, शिमला मिर्च, टमाटर, मिर्च और कच्चा स्प्राउट्स। जौ, मक्का, बाजरा, उड़द, मसूर, सोयाबीन और राजमा इनका सेवन कम करना चाहिए। पाउडर वाला दूध, बकरी का दूध, सभी प्रकार के कार्बोनेटेड ड्रिंक, नाशपाती का रस, अनार का रस, चाय, कॉफी आदि।

आयुर्वेद में वात दोष क्या है?

वात में ज्यादातर दो तत्व वायु और अंतरिक्ष (जिसे ईथर भी कहा जाता है) शामिल हैं और इसे आम तौर पर ठंडा, हल्का, शुष्क, खुरदरा, बहने वाला और विशाल के रूप में वर्णित किया गया है। शरद ऋतु अपने ठंडे, कुरकुरे दिनों के लिए वात का प्रतिनिधित्व करती है। वात दोष वाले लोगों को आमतौर पर पतला, ऊर्जावान और रचनात्मक बताया जाता है।

रोगशरीर में वात-पित्त-कफ समान रूप से होने पर व्यक्ति स्वस्थ रहता है। यदि शरीर में इन तीनों का संतुलन बिगड़ जाए तो कई रोग हो जाते हैं। यहां प्रस्तुत हैं वात से होने वाले 80 रोग

Vatta Dosha Disease 🦠

  1. नखभेद : नाखूनों का टूटना।
  2. विपादिका : हाथ-पैर फटना।
  3. पादशूल : पैरों में दर्द होना।
  4. पादभ्रंश : पैरों पर नियंत्रण न हो पाना।
  5. पादसुप्तता : पैरों का सुन्न होना।
  6. वात खुड्डता : पैर व जांघ की संधियों में वात जन्य वेदना का होना, पिंडली वाली दो हड्डियां, घुटनों के नीचे वाली दो हड्डियों (जंघास्थि और अनुजंघास्थि) टखने से एड़ी तक के हिस्से के जोड़ों में दर्द और लंगड़ापन।

  1. गुल्फ ग्रह : (गुल्फ प्रदेश का जकड़ जाना)- एड़ी के आसपास सात हड्डियों के समूह को गुल्फ प्रदेश कहते हैं।
  2. पिडिकोद्वेष्टन : पैर की पिंडलियों में ऐंठन जैसा दर्द।
  3. ग्रध्रसि : सायटिका का दर्द। इसमें कमर से कूल्हे की हड्डी में होकर पैर तक एक सायटिका नाड़ी (ग्रध्रसि नाड़ी) में सुई की चुभन जैसा दर्द होता है।
  4. 1 जानू भेद : घुटनों के ऊपर वाली हड्डी। ये दोनों पैरों पर 1-1 होती है। इसमें टूटने जैसा दर्द।
  5. जानुविश्लेष : जानू की संधियों का शिथिल हो जाना।
  6. उरूस्तंभ : जानू हड्डी का जकडऩा। यदि दर्दनाशक तेल मलने से दर्द बढ़े तो उरूस्तंभ वात रोग होता है वर्ना नहीं।
  7. ऊरूसाद : ऊरूप्रदेश में अवसाद यानी शिथिलता का अनुभव होना।
  8. पांगुल्य : लंगड़ापन।
  9. गुदभ्रंश : गुदा बाहर निकलना।
  10. गुदा प्रदेश में दर्द।
  11. वृषणोत्क्षेप (अंडग्रंथियों का ऊपर चढ़ जाना)।
  12. शेफ स्तंभ : मूत्रेन्द्रियों में जकड़ाहट।
  13. वंक्षणानाह : वंक्षण प्रदेश में बंधन के समान पीड़ा होना।
  14. श्रोणिभेद : कूल्हे वाली हड्डी में तोडऩे जैसा दर्द।
  15. विड्भेद : मल स्थान के आसपास तोडऩे जैसी पीड़ा।
  16. उदावर्त : पेट की गैस ऊपर की ओर आना।
  17. खंजता : लंगड़ापन आना।
  18. कुब्जता : कूबड़ का होना।
  19. वामनत्व : उल्टी होना।
  20. त्रक ग्रह : पृष्ठ ग्रह- पीठ व नीचे तक बैठक वाली स्थान की हड्डी त्रिकास्थि में दर्द होना।
  21. पाश्र्वमर्द : पाश्र्व प्रदेश में मर्दन के समान पीड़ा होना।
  22. उदरावेष्ट : पेट में ऐंठन होना।
  23. दिल बैठने जैसा महसूस होना।
  24. हृदद्रव हृदय में द्रवता अर्थात् शीघ्रता से गति का होना।
  25. वक्षोद्घर्ष (वक्षप्रदेश में घिसने के समान पीड़ा)।
  26. वक्षोपरोध : वक्ष:स्थल की गतियां यानी फुफ्फुस व हृदय गति में रुकावट का अनुभव।
  27. वक्ष:स्तोद : छाती में सुई चुभने जैसी पीड़ा।
  28. बाहूशोष : भुजा से अंगुली तक मांसपेशियों में दर्द, ऐंठन व जकडऩ। हाथ ऊपर न उठना।
  29. ग्रीवास्तम्भ : गर्दन का जकड़ जाना।
  30. मंथा स्तम्भ : गर्दन के पीछे लघु मस्तिष्क के नीचे के हिस्से में जकडऩ व पीड़ा।
  31. कंठोध्वंस : गला बैठ जाना।
  32. हनुभेद : ठोडी में पीड़ा।
  33. ओष्ठभेद : होंठों में दर्द।
  34. अक्षिभेद : आंखों में दर्द।
  35. शरीर का रंग लाल होना।
  36. नींद न आना।
  37. चित्त स्थिर न रहना
  38. दन्तभेद : दांतों में पीड़ा।
  39. दन्तशैथिल्य : दांतों का हिलना।
  40. मूकत्व : गूंगापन।
  41. बाक्संग : आवाज बंद होना।
  42. कषायास्यता : मुंह कड़वा होना।
  43. मुखशोष : मुंह का सूखना।
  44. अरसज्ञता : रस का ज्ञान न होना।
  45. घ्राणनाश : गंध का ज्ञान न होना।
  46. कर्णमूल : कान की जड़ में दर्द(कान के पीछे वाला हिस्सा कंठ से कुछ पूर्व का भाग तक)
  47. अशब्द श्रवण : ध्वनि न होते हुए भी शब्दों का सुनना।
  48. उच्चै:श्रुति : ऊंचा सुनना, बहरापन।
  49. वत्र्म स्तंभ : आंखों की पलकें ऊपर- नीचे नहीं होना।
  50. वत्र्म संकोच : नेत्र में सूजन व पलकें सिकुड़ जाती हैं जिससे आंखें खोलने में परेशानी होने लगती है।
  51. तिमिर : आंखों से धुंधला व कम दिखाई देना।
  52. नेत्रशूल : आंखों में दर्द होना।
  53. अक्षि व्युदास : नेत्रों का टेढ़ा होना।
  54. भ्रूव्य दास : भौंहों का टेढ़ा होना।
  55. शंखभेद : कनपटी में दर्द।
  56. ललाट भेद : आंखों के ऊपर वाले हिस्से में पीड़ा।
  57. शिर : सिरदर्द।
  58. केशभूमिस्फुट : बालों की जड़ों में विकृति होना।
  59. अर्दित : मुंह का लकवा।
  60. एकाग घात : इसमें पेशी शिथिल हो जाती है।
  61. सर्वांगघात : यह जन्मजात मस्तिष्क का रोग है।
  62. आक्षेपक : हाथ पैरों को जमीन पर पीटना व बार-बार उठाना, मस्तिष्क में वातनाड़ी दूषित होने पर मिर्गी जैसे झटके आना।
  63. इसे दंडापतानक कहते हैं।
  64. तम: तमदोष: झुंझलाहट होना।
  65. भ्रम: चक्कर आना।
  66. वेपथु: कंपकंपी होना, 71. जंभाई : उबासी आना। हिचकी।
  67. विषाद्: दुखी रहना।
  68. अतिप्रलाप: बिना बात के निरर्थक बोलना।
  69. शरीर में रूक्षता: रुखापन।
  70. शरीर में परुषिता: शिथिलता आना। शरीर का काला होना।